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इस्लाम, यहूदी और ईसाई तीनों धर्मों के लिए अहम स्थान है यरुशलम: जानिए क्या हैं? इजराइल-फिलिस्तीन विवाद की जड़

 इस्लाम, यहूदी और ईसाई तीनों धर्मों के लिए अहम स्थान है यरुशलम: जानिए क्या हैं? इजराइल-फिलिस्तीन विवाद की जड़

हमारे देश में बहुत कम लोग जानते होंगे कि ईसाई, यहूदी और इस्लाम धर्म के बीच बहुत सी समानताएं हैं। लेकिन उससे पहले जान लेते है, कि कौन होते हैं ये यहूदी? यहूदी यानी 'जेव्स' इन्हें अरबी में यहूदी कहा जाता हैं। ये प्राचीन लोगों का वह समुदाय हैं जो अब इजरायल और फिलिस्तीन में रह रहा हैं। बाइबल परंपरा के अनुसार 'अब्राहम' (अबराहम या इब्राहिम) के पोते जैकब के वंशज होते हैं यहूदी...

हजरत अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग इन्हें अपना पितामह मानते हैं। इसलिए इन्हें अब्राहम फादर ऑफ प्रोफेट भी कहा जाता हैं। कुरान में अब्राहम को इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके पोते को जैकब को हज़रत याक़ूब अहलैहिस्सलाम कहा जाता हैं। अब आप सोच रहें होंगे की तीनों धर्मों में इतनी समानताएं है तो फिर इनमें इतना वैर क्यों हैं? दरअसल यहूदी भी मुसलमानों की ही तरहा एक परमेश्वर में यकीन करते हैं। और बुतपरस्ती मना होती हैं। 

अब्राहम के पोते जैकब का दूसरा नाम 'इजरायल' था। जैकब ने ही यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक सम्मिलित राष्ट्र इजराइल बनाया था। याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा यानी (जूदा) जिसके नाम पर यहूदी धर्म कहलाया। यहूदियों के परमेश्वर का नाम यह्वे या यहोवा। ईसाइयों और यहूदियों के बाइबल के होल टेस्टामेंट ये नाम कई बार आया हैं। 

यहूदियों की धर्मभाषा 'इब्रानी' (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम 'तनख' है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया हैं। इसे 'तालमुद' या 'तोरा' भी कहते हैं। यहूदियों को दरअसल अपने अगले प्रोफेट ( Prophet ) का आज भी इंतजार हैं। और यहां मुस्लिम और ईसाईयों के बीच विचारधारा अलग हैं। दअरसल दोनों के बीच विचारधारा अलग होने के अलावा और भी कई बातें बिगड़ी येरुशलम जिसे जेरुसलेम भी कहा जाता हैं। 


इस शहर पर दोनों ही धर्म के लोग अपना हक मानते हैं। लेकिन आज यह शहर इजराइल के अंतर्गत आता हैं। दूसरा फर्क यह है, कि इस्लाम के आखिरी पैगंबर रसुसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यहूदियों ने अपना पैगंबर मानने से इंकार कर दिया था। और यहां दोनों के बीच बात बिगड़ी मौजूदा दौर में मुसलमानों में यहूदी विरोधी धारणा इजराइल की फिलिस्तीन के खिलाफ कार्रवाई के बाद भी बनी हैं। असर 1948 में इजराइल के राष्ट्र घोषित होने के बाद दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई और आज ये हालात है, कि ये दोनों धर्म जो एक ही वंशज से आए हैं, एक दूसरे को अपना दुश्मन मानते हैं। एक नहीं तीन-तीन धर्मों का सबसे बड़ा केंद्र हैं। जिस पा कब्जे के लिए सदियों से संघर्ष हुआ। और यह संघर्ष आज भी जारी हैं। 

जानिए कौन सा धर्म क्या दावा करता है?

यहूदियों की वॉल ऑफ दा माउंट

यहूदियों का मानना है कि यहां  पैगंबर इब्राहिम ने अपने बेटे इश्हाक की बलि देने की तैयारी की थी। यहीं से विश्व का निर्माण हुआ। यहूदी इलाके में ही कोटेल या पश्चिमी दीवार है। ये वॉल ऑफ दा माउंट का बचा हिस्सा है। इसे यहूदियों का पवित्र मंदिर कहा जाता है। यहां स्थित सिर्फ पश्चिमी दीवार है। यहूदियों का मानना है कि वास्वत में डोम ऑफ द रॉक ही होली ऑफ द होलीज है। पश्चिमी दीवार पर ही यहूदी होली ऑफ द होलीज की अराधना कर सकते हैं। 

क्या है मुस्लिमों का दावा

मुस्लिमों के इलाके में डोम ऑफ द रॉक और मस्जिद अल अक्सा स्थित है। इसे मुस्लिम हरम अल शरीफ या पवित्र स्थान कहते हैं। मस्जिद अल अक्सा इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है और इसका प्रबंधन एक इस्लामिक ट्रस्ट करती है जिसे वक्फ कहते हैं। 

मुस्लिमों का दावा है कि पैगंबर मोहम्मद मक्सा से यहां तक की एक रात में यात्रा की थी। इसके बाद पैगंबरों की आत्माओं के साथ चर्चा की थी। इतना ही नहीं मुस्लिमों का विश्वास है कि पैगंबर मोहम्मद ने यहीं से जन्नत की यात्रा की थी। 

ईसाइयों का क्या है कहना?

ईसाइयों का मानना है कि यह वही जगह है, जहां ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया और यहीं वे अवतरित हुए। यहां चर्च द चर्च आफ द होली सेपल्कर' है। यह दुनियाभर के ईसाइयों की आस्था का केंद्र है। ईसा मसीह का मकबरा सेपल्कर के भीतर ही है। इसे ही हिल ऑफ द केलवेरी कहा जाता है। 

इजराइल और फिलिस्तीन में क्या है विवाद की वजह?

इजराइल और फिलीस्तीन के बीच विवाद 100 साल से पुराना मुद्दा है। यहां पहले विश्वयुद्ध में उस्मानिया सल्तनत को हराने के बाद फिलिस्तीन हिस्से को ब्रिटेन ने अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को फिलिस्तीन को यहूदी लोगों के एक राष्ट्रीय घर के तौर पर स्थापित करने का काम सौंपा। ऐसे में फिलिस्तीन में बसे अरब के लोगों ने इसका विरोध करना शुरू किया। 

1920-40 के बीच में बसे यहूदी

यूरोप के यहूदी इसे सुरक्षित मानकर दूसरे युद्ध के दौरान यहां पहुंचे। इसी बीच अरबों और यहूदियों और ब्रिटिश शासन के बीच हिंसा हुई। 1947 में इस विवाद में यूएन ने दखल दी और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया। इसे यहूदियों ने तो स्वीकार कर लिया, लेकिन अरब इसके पक्ष में नहीं था। 

1948 में बना इजराइल

1948 में ब्रिटिश इसे छोड़कर चले गए। इसके बाद यहूदियों ने इजराइल देश बनाने का ऐलान किया। हालांकि, कई फिलिस्तिनी इसके पक्ष में नहीं थे। ऐसे में फिर युद्ध शुरू हो गया। इसके रुकने के बाद इजराइल ने अधिकतर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। वहीं, जॉर्डन के कब्जे वाली जगह को वेस्ट बैंक और मिस्त्र के कब्जे वाली जगह को गाजा नाम दिया गया। 

वहीं, यरुशलम को पश्चिमी और पूर्व दो हिस्सों में बांटा गया। पश्चिमी हिस्सा इजराइल और पूर्व जॉर्डन के कब्जे में था। 

1967 और 1982 में इजराइल ने जीती जंग

1967 के युद्ध में इजराइल ने पूर्वी यरुशलम, वेस्ट बैंक पर अपना कब्जा कर लिया। इतना ही नहीं इजराइल ने सीरिया के गोलान हाइट्स, गाजा और मिस्त्र के कुछ हिस्सों को भी अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि, बाद में गाजा से इजराइल पीछे हट गया। इजराइल यरुशलम को अपनी राजधानी मानता है। जबकि फिलिस्तीन भी इसे अपने राजधानी कहते हैं।

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